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शक्ति परीक्षण राहुल की रैली

कांग्रेस की नागपुर की रैली बड़ी होगी या फिर भाजपा की महू की रैली कांग्रेस सोनिया-राहुल गांधी की अपनी रैली को किसी भी मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मध्य प्रदेश के महू में होने वाली रैली से कमतर नहीं रखना चाहती. कांग्रेस ने अपनी रैली 11 अप्रैल को और शिवराज सरकार ने 14 अप्रैल को रखी है. अंबेडकरवादी दिखने को लेकर होड़ का आलम यह है कि कांग्रेस ने रैली को लेकर अपने सारे महासचिवों की बैठक बुलाई है. कांग्रेस में महासचिवों की बैठक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए ही होती है और कई महीनों में होती है.


अंबेडकर रैली के लिए हो रही बैठक को वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा, महासचिव जर्नादन द्विवेदी और राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने बुलाया है. तीनों वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी का मतलब साफ है कि पार्टी रैली को लेकर कोई कसर नहीं छोड़गी. मप्र में प्रधानमंत्री की रैली में राज्य के साथ केंद्र की भी मशीनरी (सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) लगी है, लिहाजा उस रैली से बड़ी चुनौती मिल रही है.

यह पहले ही साफ हो गया है कि पार्टी अंबेडकर की 125वीं जयंती के मौके पर रखी रैली से प्रभावी संदेश देना चाहती है. इसीलिए सोनिया और राहुल दोनों इस में शामिल हो रहे हैं. पार्टी के भी सारे बड़े नेताओं को कहा गया है कि वो इसमें जरूर आएं. 

महासचिवों की बैठक में कांग्रेस के सहयोगी संगठनों के प्रमुखों को बुलाने का भी मकसद यही है कि भीड़ के मामले में रैली प्रधानमंत्री की रैली से कमजोर नहीं आंकी जाए. कांग्रेस की रैली नागपुर में अवश्य हो रही है, लेकिन भीड़ का सारा जिम्मेदारी पार्टी की महाराष्ट्र इकाई पर नहीं डालना चाहती. महासचिवों की बैठक में यही चर्चा होगी कि महाराष्ट्र से लगे राज्यों से ज्यादा संख्या में और दूर वाले राज्यों से कम संख्या में ही सही कुछ कार्यकर्ता अवश्य पहुंचने चाहिएं. 

पार्टी इस रैली के लिए अधिक से अधिक संख्या में दलित कार्यकर्ताओं को नागपुर में जुटाना चाहती है. मकसद साफ है कि दलित यह समझें कि कांग्रेस अंबेडकर को कितना सम्मान देती है.